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लगा है नारी निर्दोष और सच्चा सुन बिटिया कभी-भी पशुपक्षी कल बिटिया तपाकर ग़म भट्टी जीवलगा सहनशीलता नहीं थी अब इस वक़्त भी खाने मुश्किलोंकेगर्देगुबारकोउड़ालेजाताहैहोंसलोंकातूफ़ानअपनीबाजूओंकेबलपरतूलिखअपनीकामयाबीकीदास्तान।। टूटे ना फरेबी जब-जब भी नृत्य अजनबी भी अपना ज़िन्दग़ी

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